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उत्तराखंड आपदा: प्रकृति से छेड़छाड़, विनाश का कारण

चमोली के ऋषिगंगा में आई तबाही ये चेतावनी है कि अगर अभी भी विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़ बंद नहीं हुई तो तबाही निश्चित है। ये तबाही प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव द्वारा रचित है। नदियों, पहाड़ों को कैद करने की मानव की लालसा ने प्रकृति के अंदर पल रहे गुस्से को उजागर कर दिया है जिसका नज़ारा हमें 7 फरवरी को चमोली में देखने को मिला। 2013 में केदारनाथ में आई तबाही से भी हमने कोई सबक नहीं लिया।

जब भी कोई बड़ी दुर्घटना, आपदा आती है तो कुछ दिनों तक उसके बारे में गंभीरता से विचार किया जाता है लेकिन फिर सब सामान्य हो जाता है। केदारनाथ की तबाही के बाद भी यही हुआ, कुछ दिन तक तो सरकारों ने सक्रियता दिखाई और आनन फानन में कमेटी बनाकर जांच रिपोर्ट पेश करने की बात कह दी गई। सुप्रीम कोर्ट की इस रिव्यु कमेटी का काम था हिमालय के संवेदनशील भागों में चल रहे प्रोजेक्ट्स का रिव्यु करना और रिपोर्ट देना। इस कमेटी ने अपनी जांच में 26 प्रोजेक्ट्स को खतरनाक माना था और उन प्रोजेक्ट्स में ऋषिगंगा प्रोजेक्ट भी शामिल था जो 7 फरवरी को आई तबाही में तबाह हो गया। क्योंकि यह प्रोजेक्ट ग्लेशियर के पास बन रहा था और दुर्घटना होने का खतरा ज़्यादा था। सरकार ने इस कमेटी की रिपोर्ट को दरकिनार कर ऋषिगंगा प्रोजेक्ट को बंद नहीं किया और इस पर काम चलता रहा। सरकार एक तरह से मौत को दावत दे चुकी थी लेकिन तारीख़ प्रकृति को तय करनी थी और प्रकृति ने तारीख चुनी 7 फरवरी 2021 की। ऋषिगंगा प्रोजेक्ट पर काम कर रहे कई कर्मचारी नदी में आई इस बाढ़ में बह गए, कुछ टनल में फंस गए जिनको निकालने का काम लगातार जारी है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार 150 लोगों के मारे जाने की खबर आई और इतने ही लोग इस बाढ़ में बह गए जिनका अभी कोई पता नहीं चल सका है। ऋषिगंगगा प्रोजेक्ट की शुरुआत में स्थानीय लोगों ने इसका काफी विरोध किया था लेकिन सरकार ने स्थानीय लोगों की बात को गंभीरता से नहीं लिया। स्थानीय लोगों ने किसी प्राकृतिक आपदा की आशंका भी जताई थी इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी ने भी इस प्रोजेक्ट को खतरनाक बताया था उसके बावजूद भी यह प्रोजेक्ट चलता रहा। किसी भी राजनैतिक दल के एजेंडे में पर्यावरण संरक्षण नहीं होता है लेकिन इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। आधुनिकता के दौर में पारंपरिक ज्ञान और

अनुभव की भारी अनदेखी की जा रही है।

आज इंसान अपने आप को प्रकृति से बड़ा समझने लगा है और जब जब इंसान को यह गलतफहमी हुई है तब तब प्रकृति ने अपनी ताकत का अहसास कराया है। हिमालय में विकास के अवैज्ञानिक मॉडल तबाही को न्योता दे रहे हैं। फाइव स्टार सुविधाओं के नाम पर हिमालय के बदन को छलनी किया जा रहा है। हिमालय की प्राकृतिक खूबसूरती को कृत्रिम तरीके से संवारने की कोशिश की जा रही है और यह कोशिश हिमालय को शायद बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है यही वजह है कि हिमालय अपना गुस्सा इन तबाहियों के माध्यम से ज़ाहिर कर रहा है। अब हम इंसानों को यह समझ जाना चाहिए प्रकृति से बड़ा कोई नहीं है और जब जब प्रकृति से छेड़छाड़ करने की कोशिश की जाएगी तब तब विनाश का आना तय है।

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