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घरों से क्यों गायब होती अब प्यारी नन्ही गौरैया

“चू- चू करके आती चिड़िया दाना चुगकर जाती चिड़िया” ये कविता हम सब बचपन से सुनते आए हैं। और बचपन कि इस कविता को बहुत लोग अच्छे से जानते भी हैं,कि किस तरह पहले एक छोटी सी प्यारी सी चिड़िया जिसका नाम गौरैया है वह हमारे घर के आंगन म फुदकती थी और बहुत सारी गौरैया हमारे घरों में अक्सर दिखाईं देती थी,मानो जैसे वै घर आंगन का हिस्सा हो, और हो भी क्यों ना उस समय लोग इतनी आधुनिक चीजों से थोड़े घिरे होते थे। उस समय गांव का जीवन साधारण होता था , घरों में एक आंगन होता था जहां अनाज धुलते -सूखते थे।घरों के आस पास खूब सारे पेड़ -पौधे होते थे जिससे वहां पक्षियों को देख पाना संभव हो जाता था और ये प्यारी सी चिड़िया फुदकती नज़र आती थीं । क्योंकि घरों के आंगन में और छतो पर जो अनाज सूखता था उसे पक्षिया चुगने आ जाती थी। और पेड़- पौधे ज्यादा होते थे अतः पक्षियों को रहने मे आसानी होती थी और वो छोटी-छोटी चिड़िया खासतौर पर गौरैया तिनका- तिनका चुग कर इंसानों के घरों में घोसला बनाती थी कभी छज्जे पर,कभी घर कि अलमारियों पर तो कभी घर के कोने में और हमे उस समय कही भी इन प्यारी गौरैया का घोसला मिल जाता था। जिसे देखने के लिए हम सब मे कितनी उत्सुकता रहती थी। मानो जैसे घर कि रौनक हो । गौरैया की चू -चू की आवाज घर आंगन को एक सकारात्मक ऊर्जा देती थी किसी ने सही कहा है की गौरैया ही एक ऐसी चिड़िया है जो इंसानों के घर आंगन में घोसला बनाकर उसके करीब रहती है अब शहरों के विस्तार और हमारी बदलतीं जीवन शैली में गौरेया के रहन -सहन और भोजन मे दिक्कत आ रही है,क्योंकि आधुनिक जीवन शैली मे हम घरों मे अनाज नहीं सुखाते बल्कि रेडीमेट ले आते है हम पेड़- पोधे से दूर रहते है और पूरी तरह आधुनिक उपकरण से घिरे हुए है जिसके चलते अब प्यारी नन्ही गौरेया या अन्य पक्षी हमारे घरों में नही आते और ना ज्यादा दिखाई देती।लेकिन प्रकृति की ये अनमोल चीज गौरेया जिसकी चू- चू से घर को सकारत्मक ऊर्जा प्राप्त होती थी अब वो कही खो गई, जिसकी सबसे बड़ी वजह हम इंसान है क्योंकि आधुनिक उपकरण से इतना घिरे पड़े हैं की प्रकृति का अनुभव नही कर पा रहे है जिसके चलते अब ये प्रकृति की अनमोल देन प्यारी गौरेया भी अब हमसे दूर जा जा रही है। पहले घरों मे आंगन होते थे और आंगन से जुडा बरामदा और जब हम सब सोकर उठते थे आंख खुलते ही बहुत सारी चिडिय़ा, खासतौर गौरैया हमारे आंगन और बरामदे में भरी रहती थी। अब उनकी तादाद कम हो गई है पहले हमारे घरों में 40-50 चिडिय़ा आती थी और अब मुश्किल से 3-4 ही दिखाई देती है। गौरेया की मात्रा में इतनी तेजी से कमी आने का सबसे बड़ा कारण इंसान का प्राकृतिक रहन सहन से दूरी और आधुनिक उपकरणो से घिरा होना है । शहरों में आधुनिक सुविधा के चलते बड़े-बडे़ नेटवर्क टावर और इलेक्ट्रॉनिक खम्भो,को लगाया जा रहा है जिसके चलते इन खम्भो और टावरों से निकलने वाली तरंगे इन छोटी पक्षियों की जान कि दुश्मन बन गई है जिसके चलते गौरेया की भारी मात्रा मे कमी आई है। पेड़ों की जगह बिजली ,टेलीफोन के खंभे, मोबाइल टावर तथा बहुमंजिला इमारतों ने ले ली है। और इंसान ने बढ़ती आबादी की के लिए जो जगह बनाई है उनमे घोंसला बनाना मुश्किल है इसके अलावा ना जाने कितने पशु- पक्षी शहरीकरण के द्वारा प्रभावित हुए हैं। गौरेया आबादी मे रहने वाली चिड़िया है जो अक्सर पुराने घरों के अंदर, छप्पर या खपरैल अथवा झाड़ियों में घोसला बनाकर रहती है घास ,बीज और कीड़े -मकोड़े गौरेया के मुख्य भोजन है जो पहले उसे घरो मे मिल जाता था अब ऐसा नहीं है शहरी विस्तार की योजना बनाने वाले लोग पेड़- पौधे, घास -फूस और वनस्पति खत्म करते जा रहे हैं और जो नये पेड़ लग भी रहे हैं उनमें ना छाया है ना फल है। विविधता बोर्ड की अधिकारी इस पर कहती है की हमारी जीवन शैली ने गौरेया के अस्तित्व को ख़तरे में डाल दिया है। भारत के बहुत से हिस्सों जैसे बंगलुरु, मुंबई, दिल्ली, और दूसरो शहरों मे गौरेया की स्थिति बहुत चिंताजनक है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्ीकल्चर रिसर्च के एक सर्वेक्षण में पाया गया है की सभी राज्यों में 70से 80 प्रतिशत तक इनकी कमी दर्ज हुई है। और पर्यावरण के प्रति उदासीनता इसका सबसे बड़ा कारण नज़र आता है आधुनिक बनावट वाले मकानो मे जहा गौरैया को अब घोसला बनाने कि जगह नहीं मिलती वही जहा मिलती भी है हम उन्हे घोसला बनाने नहीं देते ,अपने घरों में थोडी सी गंदगी फैलने के डर से हम उसका इतनी मेहनत से बनाया घर तोड देते है जिसके बाद उनके अजन्मे बच्चे , शिकारियों जैसे( बिल्ली , कुत्ते,चिडिय़ा) का शिकार हो जाते हैं। गौरेया छोटे पेड़ों या झाड़ियों मे घोसला
बनाती है लेकिन मनुष्य उन्हें भी काटता जा रहा है वह बबूल, कनेर, नीबू,अमरूद, अनार, मेंदही, आदि पेड़ो को पसंद करती है परन्तु इन वृक्षों की घटती संख्या चिन्ताजनक है।इसके अलावा उनके दाना- पानी की भी समस्या है, गौरेया घरों के अनाज के साथ- साथ मुख्यत: बाज़रा, धान , के दाने और कीड़े खाती है ।लेकिन आधुनिकता ने उनसे प्रकृति प्रदत्त के ये स्रोत भी कीटनाशक दवा के कारण छीन ले रही हैं।हम गौरैया को कैसे बचाएं? इस सवाल का जवाब केवल इंसानियत ही नहीं है बल्कि गौरैया का कम या विलुप्त होना इस बात का संकेत है कि हमारे आसपास के पर्यावरण में कोई भारी गड़बड़ चल रही है, जिसका खामियाजा हमें आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा. अगर हम गौरैया को संरक्षण प्रदान कर उसे जीवनदान देते हैं, तो वह भी पारिस्थितिक तंत्र के एक हिस्से के रूप में हमारे पर्यावरण को बेहतर बनाने में अपना योगदान देती है. वह अपने बच्चों को अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े भी खिलाती है, जो हमारी फसलों के लिए हानिकारक होते हैं. प्रकृति की सभी रचनाएं कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और हम भी उनमें शामिल हैं.
विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं. नेचर फॉरेवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के विशेष प्रयासों से पहली बार वर्ष 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था. तब से ही यह दिन पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है. गौरैया के जीवन संकट को देखते हुए वर्ष 2012 में उसे दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्जा भी दिया गया था। पर हालात अभी भी जस के तस ही हैं. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी सिटीज़न स्पैरो के सर्वेक्षण में पता चला कि दिल्ली और एनसीआर में वर्ष 2005 से गौरैया की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. सात बड़े शहरों में हुए इस सर्वेक्षण में सबसे ख़राब नतीजे हैदराबाद में देखने को मिला।उत्तर प्रदेश में भी सपा सरकार के समय गौरैया के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास और जागरूकता अभियान चलाए गए थे, पर वर्तमान में वे सब ठप्प पड़े हैं.हमारी छोटी-सी कोशिश गौरैया को जीवनदान दे सकती है. सबसे पहली बात कि अगर वह हमारे घर में घोंसला बनाए, तो उसे बनाने दें. हम नियमित रूप से अपने आंगन, खिड़कियों और घर की बाहरी दीवारों पर उनके लिए दाना-पानी रखें. गर्मियों में न जाने कितनी गौरैया प्यास से मर जाती हैं. इसके अलावा उनके लिए कृत्रिम घर बनाना भी बहुत आसान है और इसमें खर्च भी न के बराबर होता है. जूते के डिब्बों, प्लास्टिक की बड़ी बोतलों और मटकियों में छेद करके इनका घर बना कर उन्हें उचित स्थानों पर लगाया जा सकता है. इंटरनेट पर खोजेंगे, तो गौरैया के लिए घर बनाने के बड़े आसान तरीके आपको आराम से मिल जाएंगे. एक बात और, गौरैया को कभी नमक वाला खाना नहीं डालना चाहिए, नमक उनके लिए हानिकारक होता है. गौरैया से हमारा बचपन का रिश्ता है. अंग्रेजी में उसका नाम ही है ‘हाउस स्पैरो’ यानी घर में रहने वाली चिड़िया है उसे हमारा बस थोड़ा-सा प्यार और थोड़ी-सी फिक्र चाहिए, रहने को थोड़ी-सी जगह चाहिए,हमारे घर में और हमारे दिलो में।

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