Jammu Kashmir Delimitation : कश्मीर में खोया वजूद बचाने के बीच नायक बनने की छटपटाहट में महबूबा

श्रीनगर, नवीन नवाज: पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने परिसीमन आयोग से मुलाकात से इन्कार कर दिया है। इससे जम्मू कश्मीर में किसी को ज्यादा हैरानी नहीं हुई है। गत रविवार को पीपुल्स एलांयस फार गुपकार डिक्लेरेशन (पीएजीडी) की बैठक में ही लगभग तय हो गया था कि पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती परिसीमन आयोग सेे मुलाकात के मामले में अलग रास्ता चुन सकती हैं। उन्होंने आयोग की वैधता पर सवाल उठाया है, लेकिन इस पूरी कवायद में वह खुद को बचाते हुए पीडीपी को जम्मू कश्मीर की सियासत में जिंदा बनाए रखने की जद्दोजहद करती नजर आती हैं। वह खुद को कश्मीर की लौह महिला साबित कर शहीद और नायक का दर्जा तलाश रही हैं। इस प्रयास में वह और उनकी पार्टी पूरी तरह से जमीन और जनता से अलग-थलग खड़ी नजर आती हैं।

परिसीमन आयोग का गठन जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत किया गया है। आयोग को मार्च 2022 में या उससे पहले केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। उसके बाद ही विधानसभा चुनाव होंगे। पीडीपी समेत मुख्यधारा की राजनीतिक से जुड़े सभी राजनीतिक दल प्रदेश में जनता की चुनी सरकार की मांग कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर को जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा मांगते हैं। इन दलों में वह भी शामिल हैं, जिन्हेंं जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन मंजूर नहीं हैं।

महबूबा ने बीते साल अक्टूबर में रिहा होने के बाद जिस तरह के कदम उठाए हैं, उससे साफ है कि वह आक्रामक रुख तो अपना रही हैं, लेकिन बचाव की मुद्रा में आगे बढ़ रही हैं। वह नए जम्मू कश्मीर की हकीकत को समझती हैं, लेकिन अपनाने से इन्कार करती हैं। उनके निरंकुश रवैये और किचन कैबिनेट के कारण ही पीडीपी के पुराने सिपहसालारों को मजबूरी में संगठन छोड़कर नया ठिकाना बनाना पड़ा। अपनी रिहाई के बाद उन्होंने हर मंच पर यही कहा है कि पीडीपी ने दिल्ली के आगे झुकने से इन्कार किया है, इसलिए उसके नेताओं को प्रताडि़त किया जा रहा है। इस दौरान उन्होंने खुद को अलगाववादियों की कतार से अलग खड़ा करते हुए यह भी कहा कि वह भारतीय संविधान में आस्था रखती हैं और भारतीय संविधान से ही अपना हक मांग रहीं हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नहीं कहेंगी तो क्या पाकिस्तान से कहेंगी।

खुद के बयान ही बने गले की फांस: पांच अगस्त, 2019 के बाद जम्मू कश्मीर की सियासत में सभी पुराने नारे आप्रसांगिक हो चुके हैं। पीडीपी के वोट बैंक का अधिकांश हिस्सा जो कट्टरपंथी तबके से जुड़ा है, वह भी उनसे नाराज है। अनुच्छेद 370 के संदर्भ में दिए गए उनके बयान ही उनके गले की फांस बने हुए हैं। इसलिए वह नहीं चाहती हैं कि कहीं भी वह जनता के सामने कमजोर नजर आएं या दिल्ली से समझौते का आरोप लगे। क्योंकि वह अपने विरोधियों, जिनमें नेशनल कांफ्रेंस भी है, को दिल्ली का पिट्ठू और भाजपा का एजेंट कहती रही हैं। यह बात अलग है कि पीडीपी ने भाजपा के साथ ही गठबंधन सरकार बनाई थी। वर्तमान में महबूबा पूरी तरह अलग-थलग नजर आती हैं।

महबूबा की इस राजनीति को भी समझें: अपने वोट बैंक और पीडीपी को सियासत में बचाए रखने के लिए महबूबा बार-बार राजनीतिक कैदियों की रिहाई की बात करती हैं। उन्हेंं मालूम है कि देर सवेर जब यह लोग रिहा होंगे तो कहा जाएगा कि पीडीपी ने प्रयास किया था। पीडीपी के कई नेता भी इस समय जेल में हैं। खुद महबूबा और उनके स्वजन प्रवर्तन निदेशालय की जांच के घेरे में हैं। इसलिए वह चाहती हैं कि केंद्र पर किसी तरह से दबाव बनाकर इन सभी से मुक्ति पाई जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में वह कश्मीरियों की हमदर्दी बटोरने का प्रयास कर रही हैं। साथ ही यह साबित करने का प्रयास कर रही हैं कि अन्य दल जो बेशक उनके साथ पीएजीडी का हिस्सा हैं, दिल्ली के आगे नतमस्तक हो चुके हैं, लेकिन वह नहीं झुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने पीएजीडी की कमान जिस तरह से डा. फारूक अब्दुल्ला को सौंपी थी, उससे साफ है कि अगर पीएजीडी कोई समझौता करेगा तो उसका जिम्मा फारूक पर होगा और जब वह खुद असहज हों तो गठबंधन के फैसले से खुद को अलग कर लें। महबूबा ने परिसीमन आयोग से मुलाकात से इन्कार कर यह साबित कर दिया है।

यह विकल्प क्यों नहीं अपनाया: परिसीमन आयोग की वैधता का अगर सवाल होता तो पीडीपी आयोग से मिलकर यह बात कह सकती थी। वह इसे अदालत में भी चुनौती दे सकती थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। महबूबा के पास परिसीमन आयोग से कहने के लिए कुछ नहीं था। वह इसका ठीक उसी तरह लाभ लेना चाहती हैं जिस तरह से सर्वदलीय बैठक के बाद करने का प्रयास किया।  

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