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पश्चिम बंगाल: दीदी की बढ़ती मुश्किलें

पश्चिम बंगाल: दीदी की बढ़ती मुश्किलें

पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे वहां की राजनीति भी गर्म हो रही है। लेकिन सोचने वाली बात ये है की पांच साल पहले किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी की ममता बनर्जी को वर्ष 2021 में अपने अस्तित्व के लिए जूझना होगा? पश्चिम बंगाल का यह इतिहास है कि सत्ता में रहने वाली पार्टियां तीन दशकों तक सत्ता में रहती हैं। किसने सोचा होगा कि ममता पर वार वामपंथियों की ओर से नहीं, बल्कि भाजपा की तरफ से होगा, जो दो दशकों से इस पूर्वी राज्य में पांव जमाने की कोशिश कर रही है? या यूं कहे की वामपंथी दल और कांग्रेस, जो पांच दशकों से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं, अपना अस्तित्व बचाने के लिए एक-दूसरे से हाथ मिलाएंगे? ये भी देखना होगा।

अभी कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 124 वीं जयंती पर श्रद्धांजलि देने के लिए बंगाल पहुंचे। राष्ट्रीय नायक की विरासत पर परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों का दावा करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन 23 जनवरी को इसकी पराकाष्ठा देखने को मुख्य रूप से मिली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विक्टोरिया मेमोरियल हॉल में आयोजित होने वाले उस कार्यक्रम में मोदी के साथ मंच साझा करना स्वीकार किया था। उस मेगा शो में दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होने थे। उस मंच से ममता अपना भाषण देने ही वाली थीं कि अचानक दर्शकों में ‘जय श्री राम’ के नारे लगने लगे। इस घटना ने कहानी को नया मोड़ दे दिया। मोदी ने अपने लंबे चौड़े भाषण में नेताजी की काफी प्रशंसा की थी, लेकिन इसकी बजाय ममता का उस मौके पर बोलने से इनकार करना सुर्खियों में रहा। घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भी इस नारेबाजी की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मुख्यमंत्री का अपमान नहीं बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक और सांप्रदायिक राजनीति के प्रबल विरोधी नेताजी का भी अपमान है। जवाब में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ममता पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाया और यहां तक कहा कि इतनी छोटी सी बात पर बोलने से इनकार करना नेताजी का अपमान है।

जैसे –जैसे पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे राजनीति भी अपनी चरम सीमा पर है। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में कसमे-वादों की भरमार मची हुई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आने वाले दिनों में, बंगाल निवेश और रोजगार के अवसरों का केंद्र होगा। उन्होंने कहा कि बंगाल आगे बढ़ेगा, पूरी दुनिया यहां आएगी। वहीं हल्दिया में रैली को संबोधित करने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर आप दीदी से अपने अधिकारों को मांगते हैं, तो उन्हें बूरा लग जाता हैं। वह भारत माता की जय के नारे लगाने तक से नाराज हो जाती हैं।  ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर हमला बोलते हुए मोदी ने कहा कि बंगाल के लोगों ने ‘बुआ-भतीजावाद’ को समाप्त करने का निर्णय लिया है। तृणमूल कांग्रेस ने एक के बाद एक गड़बड़ी की, कुप्रबंधन की गड़बडी, जनता के धन की लूट की गड़बड़ी की है।

इसके साथ ही उन्होंने भारत सहित पूरी दुनिया को दिशा दिखाने वाले महान मनीषियों, संतों, वीरों की पावन धरा- बंगाल को झुककर नमन किया। आपको ये भी समझना चाहिए की हल्दिया सहित पश्चिम बंगाल के विकास से जुड़ी करीब 5,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास के लिए प्रधानमंत्री वहां पहुंचे थे। इसके साथ ही मोदी ने पश्चिम बंगाल का विकास और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण ,कोलकाता में साढ़े 8 हज़ार करोड़ रुपए की लागत से मेट्रो प्रोजेक्ट पर तेज़ी से काम की विशेष रूप से चर्चा की

अब हम कुल मिलाकर बंगाल के चुनाव परिणाम की बात करे तो ये आने वाले समय में ही पता लगेगा। लेकिन जो राजनीतिक पार्टीयों का फेर- बदल देखने को मिल रहा है वह बेहद दिलचस्प है।पश्चिम बंगाल में 27 से 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिस पर तृणमूल, वाम दल, कांग्रेस और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम दावा जताने जा रही हैं। राज्य आज हिंदू-मुस्लिम लाइन पर ध्रुवीकरण के लिए अति संवेदनशील है, जो इन दिनों हो रहा है। उससे यह प्रतीक हो रहा है कि भाजपा राज्य में प्रबल ताकत है और ममता बनर्जी बैकफुट पर हैं। भाजपा, जिसने 2016 के विधानसभा चुनाव में 294 में से मात्र तीन सीटें जीती थीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतने में सफल रही। यानी 125 विधानसभा क्षेत्रों में उसे बढ़त है और उसका वोट शेयर 40 फीसदी है। ममता की तृणमूल ने 22 लोकसभा सीटें जीती और उसे 44 फीसदी वोट मिले। इसलिए लोकप्रिय वोट में चार-फीसदी की बढ़त भाजपा के लिए निर्णायक होना चाहिए।

पश्चिम बंगाल लंबे समय से भाजपा के निशाने पर रही है और उसके नेतृत्व ने राज्य में भारी ऊर्जा खपाई है। उनके लिए पश्चिम बंगाल केवल पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों का द्वार नहीं है और न ही महज एक राज्य पर कब्जा करने का मामला है, जो कि पूरे भारत में भाजपा का वर्चस्व स्थापित करने में उसकी मदद करेगा। निस्संदेह ये महत्वपूर्ण विचार हैं। लेकिन प. बंगाल जीतना एक अन्य कारण से महत्वपूर्ण हो सकता है। ममता बनर्जी नामक साहसी  नेता पर बढ़त पाना, जिसने विपक्ष के किसी अन्य नेता की तुलना में भाजपा को जमीनी स्तर पर ज्यादा कड़ी टक्कर दी है। बहरहाल प. बंगाल का खेल अभी शुरू हुआ है। कुल मिलाकर अभी हम सिर्फ आंकलन कर सकते है, लेकिन पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी वो तो जनता को ही तय करना है। लोगों की पहली पंसद कौन सी पार्टी बनने वाली है वह आने वाले तीन महीने के बाद ही पता चलेगा । जनता किस पार्टी को चुनेगी, किसका राजतिलक करेगी और किसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाएगी ये देखना अहम होगा।

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