अभी-अभी:अरविंद केजरीवाल का छिना CM पद का कार्यभार-विडियो

केंद्र और दिल्‍ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार के बीच टकराव के पूरे आसार बन रहे हैं। लोकसभा में सोमवार को एक विधेयक पेश किया गया है जिसमें उप-राज्‍यपाल को ज्‍यादा अधिकार दिए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा यह भी स्‍पष्‍ट किया गया है कि राज्‍य कैबिनेट या सरकार के किसी भी फैसले को लागू करने से पहले एलजी की ‘राय’ जरूरी होगी।

मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस बिल को ‘अंसवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ करार दिया है। हालांकि केंद्र में सत्‍तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कहना है कि इससे कोऑर्डिनेशन आसान हो जाएगा। आइए जानते हैं कि इस बिल में क्‍या है और दोनों पक्षों के तर्क क्‍या हैं। इसके अलावा दिल्‍ली और केंद्र के बीच की खींचतान पर शीर्ष अदालत क्‍या कह चुकी है।

  • सरकार को केाई भी फैसला लागू करने से पहले एलजी की ‘राय’ लेनी होगी, इनमें वह फैसले भी शामिल हैं जो मंत्रिमंडल करेगा।
  • एलजी उन मामलों को तय कर सकेंगे जिनमें उनकी ‘राय’ मांगी जानी चाहिए।
  • विधानसभा के बनाए किसी भी कानून में ‘सरकार’ का मतलब एलजी होगा।
  • विधानसभा या उसकी कोई समिति प्रशासनिक फैसलों की जांच नहीं कर सकती और उल्लंघन में बने सभी नियम रद्द हो जाएंगे।

सूत्रों के अनुसार, इन बदलावों का यह मतलब होगा कि राजधानी का दर्जा किसी अन्‍य केंद्रशासित प्रदेश जैसा हो जाएगा। वहीं AAP सरकार का मानना है कि यह बिल उसको अपंग बनाने के लिए लाया गया है।

  • केंद्र सरकार वर्तमान अधिनियम की धारा 44 में एक नया प्रावधान जोड़ना चाहती है। प्रस्‍तावित संशोधन कहता है कि दिल्‍ली में लागू किसी भी कानून के तहत ‘सरकार, राज्‍य सरकार, उचित सरकार, उप राज्‍यपाल, प्रशासक या मुख्‍य आयुक्‍त या किसी के फैसले’ को लागू करने से पहले संविधान के अनुच्‍छेद 239AA के क्‍लॉज 4 के तहत, ऐसे सभी विषयों के लिए उपराजयपाल की राय लेनी होगी। यह विषय एलजी एक सामान्‍य या विशेष आदेश के जरिए स्‍पष्‍ट कर सकते हैं। अनुच्‍छेद 239AA में दिल्‍ली से जुड़े विशेष प्रावधानों का जिक्र है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रावधान के बाद प्रस्‍तावों को एलजी तक भेजने या न भेजने को लेकर दिल्‍ली सरकार कोई फैसला नहीं कर सकेगी।
  • एक और प्रस्‍ताव में केंद्र ने कहा है कि एलजी विधानसभा से पारित किसी ऐसे बिल को मंजूरी नहीं देंगे जो विधायिका के शक्ति-क्षेत्र से बाहर हैं। वह इसे राष्‍ट्रपति के विचार करने के लिए रिजर्व रख सकते हैं।
  • संशोधन बिल के अनुसार, विधानसभा का कामकाज लोकसभा के नियमों के हिसाब से चलेगा। यानी विधानसभा में जो व्‍यक्ति मौजूद नहीं है या उसका सदस्‍य नहीं है, उसकी आलोचना नहीं हो सकेगी। सूत्रों ने कहा कि पहले कई मौकों पर ऐसा हुआ जब विधानसभा में शीर्ष केंद्रीय मंत्रियों के नाम लिए गए थे।
  • एक और प्रावधान ये है कि विधानसभा खुद या उसकी कोई कमिटी ऐसा नियम नहीं बनाएगी जो उसे दैनिक प्रशासन की गतिविधियों पर विचार करने या किसी प्रशासनिक फैसले की जांच करने का अधिकार देता हो। यह उन अधिकारियों की ढाल बनेगा जिन्‍हें अक्‍सर विधानसभा या उसकी समितियों द्वारा तलब किए जाने का डर होता है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक ट्वीट में कहा, “केंद्र की बीजेपी सरकार संसद में असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बिल लेकर आई है, इस बिल पास होने के बाद दिल्ली की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार की बजाय उपराज्यपाल ही दिल्ली सरकार बन जाएंगे।

डेप्‍युटी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा कि “दिल्ली की जनता द्वारा विधानसभा और एमसीडी उपचुनाव में खारिज किये जाने के बाद केंद्र में बैठी भाजपा सरकार ने दिल्ली की जनता द्वारा चुनी गई दिल्ली सरकार के अधिकारों को छीन कर उपराज्यपाल को देने के बिल को लाने की तैयारी कर ली है। केंद्र सरकार द्वारा लाया गया यह बिल लोकतंत्र और संविधान की आत्मा के खिलाफ होगा। इस बिल के माध्यम से बीजेपी उपराज्यपाल के साथ पिछले दरवाजे से दिल्ली की जनता पर शासन करने की तैयारी में है। भाजपा की केंद्र सरकार एलजी की शक्तियां बढ़ाकर दिल्ली के विकास को रोकने की तैयारी में है।

दूसरी तरफ, बिल का स्‍वागत करते हुए दिल्‍ली विधानसभा में विपक्ष के नेता रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कहा कि यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। उन्‍होंने कहा कि इस बिल से दिल्‍ली में गवर्नेंस बेहतर होगी और प्रशासन से जुड़े अहम मामलों में राज्‍य सरकार और उपराज्‍यपाल की संवैधानिक भूमिकाएं स्‍पष्‍ट होंगी। दिल्‍ली बीजेपी के चीफ आदेश गुप्‍ता ने कहा कि इस बिल से आखिरकार केंद्र और दिल्‍ली की सरकारों के बीच के प्रशासनिक कार्यों और शक्तियों का विवाद खत्‍म हो जाएगा।

कांग्रेस ने कहा कि इस बिल से दिल्‍ली के लोगों की शक्तियां छीन ली जाएंगी। पार्टी ने इसे ‘काला बिल’ बताते हुए बुधवार को इसके खिलाफ जंतर मंतर पर धरना देने का भी ऐलान किया। पूर्व विधायक अनिल भारद्वाज ने कहा कि दिल्‍ली सरकार के पास पहले से ही जमीन और पुलिस को लेकर कोई ताकत नहीं है, यह बिल उसे और कमजोर करेगा।

एलजी को निरंकुश शक्तियां देगा यह बिल’

संविधान की व्याख्या के खिलाफ जाते हुए यह बिल पुलिस, भूमि और पब्लिक ऑर्डर के अतिरिक्त एलजी को अन्य शक्तियां भी देगा। यह बिल जनता द्वारा चुनी दिल्ली सरकार की शक्तियां कम कर एलजी को निरंकुश शक्तियां प्रदान करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में क्‍या कहा था?

4 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली में एलजी मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने एलजी के अधिकार को सीमित करते हुए अपने फैसले में कहा था कि एलजी स्वतंत्र तौर पर काम नहीं करेंगे, अगर कोई अपवाद है तो वह मामले को राष्ट्रपति को रेफर कर सकते हैं और जो फैसला राष्ट्रपति लेंगे उस पर अमल करेंगे। यानी, खुद कोई फैसला नहीं लेंगे।

दिल्ली सरकार को क्या मिला था?

  • 239 एए के तहत सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की है कि मंत्रीपरिषद के पास एग्जीक्यूटिव पावर्स हैं।
  • मंत्रिपरिषद राज्य और समवर्ती सूची में जो भी विषय हैं उसमें तीन अपवाद को छोड़कर बाकी मामले में स्वतंत्र होकर काम कर सकेगी।
  • पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और लैंड को छोड़कर राज्य सूची में जो भी विषय हैं, उसमें राज्य सरकार कानून बना सकती है।
  • जो भी फैसला सरकार लेगी उसके बारे में वह एलजी को अवगत कराएगी, लेकिन एलजी की सहमति जरूरी नहीं है।
  • अपवाद के तहत एलजी किसी मामले को राष्ट्रपति को रेफर कर सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ हर मामला नहीं है। यह सरकार के लिए राहत की बात है।

एलजी को क्या मिला था?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजमेंट में दिए गए सिद्धांत को ध्यान में रखकर मामले को एलजी डील कर सकते हैं। यानी जजमेंट में जो व्यवस्था दी गई है, उसी दायरे में काम करना होगा
  • 239 एए के क्लॉज-4 में अपवाद की व्याख्या की गई है। इसके तहत एलजी अपवाद वाले मामले को राष्ट्रपति को रेफर कर सकते हैं।

पूरे विवाद की जड़ है अनुच्छेद-239 एए

अनुच्छेद-239 एए क्‍या कहता है?

साल 1991 में संविधान में 69वां संशोधन कर अनुच्छेद-239 एए का प्रावधान किया गया, जिसमें दिल्ली को विशेष प्रावधान के तहत अपने विधायक चुनने का अधिकार दिया गया। दिल्ली के लिए विधानसभा की व्यवस्था की गई जिसे राज्यसूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाने का अधिकार होगा। हालांकि पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और लैंड को इसके अपवाद में रखा गया जो केंद्र के नियंत्रण में रहेंगे।

SC ने क्‍या व्‍याख्‍या की?

कई सालों से दिल्ली में एलजी और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों की लड़ाई जारी थी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने अनुच्छेद-239 एए की व्याख्या की थी।

  • तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली संवैधानिक बेंच ने कहा था दिल्ली में एलजी की स्थिति राज्यों के गवर्नर जैसी नहीं है। वह एक प्रशासक हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के फैसले में कहा था कि इसमें निरंकुशता के लिए कोई जगह नहीं है। साथ ही, अराजकता के लिए भी कोई स्थान नहीं है।
  • संतुलित संघीय व्यवस्था का मतलब है कि केंद्र तमाम अधिकार अपने पास न रखे, बल्कि राज्य अपनी परिधि में बिना दखल के काम करें।
  • बेंच ने कहा था कि 239 एए में जो व्याख्या है उसमें एलजी को मंत्रिपरिषद की सलाह मानना अनिवार्य है। यह अनिवार्यता तब तक होगी जब तक कि वह क्लॉज-4 के तहत मामले को राष्ट्रपति को रेफर न कर दें।
  • एलजी को खुद स्वतंत्र तौर पर फैसला नहीं लेना है। वह या तो मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करेंगे या फिर राष्ट्रपति को रेफर करेंगे और राष्ट्रपति के फैसले पर अमल करेंगे।
  • अपवाद में कहा गया है कि एलजी किसी भी मामले को राष्ट्रपति को रेफर कर सकते हैं। लेकिन, किसी भी मामले का मतलब हर मामला नहीं हो सकता।

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